कोरोना महामारी के बीच प्रदूषण को लेकर खतरनाक आंकड़े आ रहे हैं. पंजाब रिमोट सेंसिंग सेंटर (PRSC) के मुताबिक इस बार पिछले साल से लगभग चार गुना ज्यादा पराली जलाई जा चुकी है. साथ ही साथ दिल्ली-एनसीरआर की हवा में भारीपन आने लगा है. माना जा रहा है कि प्रदूषण से कमजोर पड़े श्वसन तंत्र पर कोरोना का हमला और डरावना हो सकता है. जानिए, क्या और कितनी विकराल है प्रदूषण की ये समस्या.

क्या है कोरोना का प्रदूषण से संबंध
कई ऐसी रिसर्च आ चुकी हैं जो बताती हैं कि कोरोना वायरस के खतरे और वायु प्रदूषण का कितना गहरा संबंध है. न्यूयॉर्क टाइम्स ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के हवाले से इसका विस्तार से जिक्र किया. इसके मुताबिक कोरोना के वो मरीज, जो प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हैं, उनके रिकवरी काफी धीमी हो जाती है. अमेरिका में हुए इस शोध में 3,080 क्षेत्रों को शामिल किया गया था.

इसके मुताबिक हवा में पाए जाने पार्टिकल PM का कोरोना डेथ से ताल्लुक है. इसमें ये भी पाया गया कि अगर अमेरिकी स्टेट मैनहट्टन ने पिछले 20 सालों में अपने प्रदूषण का स्तर थोड़ा भी घटाया होता, तो वहां कोरोना से हुई मौतों में कई सैकड़ा मौतें कम हो सकती थीं.

प्रदूषण और कोरोना की गंभीरता को लेकर विशेषज्ञ भारत के बारे में भी चिंता जता चुके हैं- सांकेतिक फोटो (Pixabay)

स्टडी के ओवरऑल आंकड़े कहते हैं कि प्रदूषित हवा में रहने वाले लोग अगर कोरोना संक्रमित हो जाएं तो उनके मौत की दर 15 प्रतिशत तक ज्यादा होती है.

भारत पर जताई जा रही चिंता
वायु प्रदूषण पर किताब Choked: Life and Breath in the Age of Air Pollution की लेखिका बेथ गार्डाइनर कहती हैं कि प्रदूषित देशों जैसे भारत में कोरोना की समस्या और डरावनी होकर आ सकती है. चूंकि लंबे समय तक प्रदूषित हवा में सांस लेने के कारण लोगों के फेफड़े पहले से ही कमजोर होते हैं, ऐसे में कोरोना का हमला जानलेवा साबित हो सकता है.

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दिल्ली-एनसीआर में पराली का अटैक
मानसून के खत्म होने के बाद से सर्दियों के आगमन के साथ ही दिल्ली सहित उत्तर भारत में हवा स्थिर हो जाती है. ऐसे में जब पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के इलाकों में किसान पराली जलाते हैं तो वह धुंआ कहीं न जाकर इसी वातावरण में रह जाता है और हवा की नमी के साथ भारी होने के साथ ही उत्तर भारत पर एक मोटी परत के तौर पर फैल जाता है.

दिल्ली में हवा की क्वालिटी बेहद खराब हो चुकी है (Photo- news18 English)

हर साल इलाके की यही समस्या
पिछले कुछ सालों से कोहरे की इस परत में सर्दियों की शुरुआत में दिल्ली और उसके आस-पास के इलाकों के लोग जीने को मजबूर हैं. इस साल भी एयर क्वालिटी एंड वेदर फोरकास्टिंग एंड रिसर्च के अनुसार दिल्ली में हवा की क्वालिटी बेहद खराब हो सकती है. हालांकि दिल्ली में खराब हवा का यह एकमात्र कारण नहीं है. बढ़ते वाहन और दूसरी वजहें भी हैं लेकिन आसपास के राज्यों में पराली का जलाया जाना दिल्ली के वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण जरूर माना जाता है.

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कोशिशें हुईं लेकिन नाकाम रहीं
पराली जलाए जाने पर बैन रहा है और कई बार इस मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल दखल दे चुका है लेकिन पराली जलाया जाना बिना किसी रुकावट के जारी है. पिछले साल नवंबर में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने राज्यों को इस समस्या के समाधान के लिए सुझाव मांगे थे. ट्रिब्यूनल चाहता था कि राज्य बताएं कि इसे कैसे रोका जा सकता है ताकि किसानों को इंसेंटिव और इसके लिए इंफ्रास्ट्रक्चर असिस्टेंस देकर इस पर रोक लगाई जा सके. लेकिन तमाम प्रयास जो किसानों के पराली जलाने को रोकने के लिए किए गए, किसी काम नहीं आए.

पराली जलाना अगली फसल के लिए खेतों को तैयार करने का सस्ता तरीका लगता है- सांकेतिक फोटो (Pixabay)

किसानों के हिस्से का तर्क 
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) इस तरह से पराली का जलाया जाना 2015 में बैन कर चुका है. लेकिन किसानों का मानना है कि अगली फसल के लिए खेतों को तैयार करने का यह उनके लिए सबसे सस्ता तरीका है. ऐसा करने से केवल 15 दिन में यह खेत अगली फसल के लिए तैयार हो जाते हैं. किसानों की दलील रही है कि अगर वे बची हुई पराली को खेतों से खुद हटाएं तो ऐसा करने में उन्हें 5 हज़ार रुपये प्रति एकड़ का खर्च आएगा.

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क्या ये मशीनी खेती का खामियाजा है
हर साल किसान हज़ारों एकड़ खेती की जमीन पर आग लगा देते हैं. ऐसा वे धान की फसल के कटने के बाद बची हुई पराली को खत्म करने के लिए करते हैं. लेकिन उनके ऐसा करने के बाद ज्यादातर उत्तर भारत पर काली धुंध की एक मोटी परत बिछ जाती है. वैसे किसान पहले से ही पराली जलाते आए हैं. लेकिन हाल में यह चलन मशीनी खेती के चलते ज्यादा बढ़ा है. क्योंकि पहले पराली का दूसरे कृषि और घरेलू कामों में इस्तेमाल हो जाता था. लेकिन अब मशीनों से कटाई के चलते ऐसा नहीं हो पाता है.





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