नई दिल्ली. सरकारी नौकरी (Government Job) के इंतज़ार में रहे शिक्षित युवा अब चुनावी मैदान में कूद गए है.आप सोच रहे होंगे यह युवा अपनी इच्छा से राजनीति में आ रहे हैं यह तो अच्छी बात है लेकिन मामला कुछ अलग है. आज 100 से ज्यादा उम्मीदवारों ने लिम्बडी विधानसभा (Limbadi) के उपचुनाव (Bypolls) मैं निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर नामांकन भरा. दरअसल पिछले कुछ समय से अलग अलग सरकारी भर्तियों के लिए सरकारी परीक्षा पास करने के बावजूद सरकारी नियुक्ति नहीं होने से ये युवा नाराज हैं. कुछ युवा तो पिछले डेढ़ साल से सरकारी पदों ओर नियुक्ति का इंतजार कर रहे हैं.

युवाओं ने कहा सरकार उन्हें जल्दी सरकारी नौकरी का भरोसा नहीं देती तो आठ विधानसभा सीटों पर हो रहे चुनाव मे चार विधानसभा सीटों निर्दलीय उम्मीदवारी दर्ज करेंगे. गौरतलब है कि राज्यसभा चुनाव के वक्त कांग्रेस के 8 विधायकों ने इस्तीफा दिया था उसके बाद इन सीटों पर उपचुनाव होने जा रहे हैं. आज के दिन ही 100 से ज्यादा उम्मीदवारों ने नामांकन भरा जिसके चलते नामांकन फॉर्म ही ख़त्म हो गए.

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लोकरक्षक दल हो, चाहे असिस्टेंट प्रोफेसर, चाहे एसआरपीएफ हो या टाट हो सरकारी भर्तियां किसी न किसी कारण से रुकी हुई हैं. कई सरकारी भर्तियों की तो परीक्षाएं भी हो गयी हैं और नतीजे भी आ गए हैं बावजूद इसके भर्तियां अटकी पड़ी हैं.नौकरियों पर ये है सरकारी दावा
सरकारी दावे के मुताबिक पिछले 4 सालों में एक लाख 4 हजार भर्तियां की गई हैं जबकि युवा नेता दिनेश बम्भाणीया के मुताबिक 54 हजार भर्तियों में अबतक नियुक्तियां ही नहीं हुई हैं और इसके चलते ही पिछले कुछ समय से यह युवा आंदोलन चला रहे हैं.

नामांकन भरने के बाद युवाओं ने चुनाव प्रचार की भी रणनीति तैयार कर ली है. युवाओं ने कहा कि हम गांव-गांव जाकर खाट परिषद करेंगे और जनता को सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ जागृत करेंगे.

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एक सीट पर ही 180 से ज्यादा उम्मीदवार
लिम्बडी विधानसभा सीट पर ही 180 से ज्यादा निर्दलीय उम्मीदवार खड़े किए जायेंगे. केवल लिम्बडी ही नहीं मोरबी, धारी, करजन, अबड़ासा, गढ्डा, डांग और कपराड़ा सीटों पर चुनाव होने हैं. इस में से चार सीट लिम्बडी, मोरबी, धारी और करजन में युवा अपनी किस्मत आजमाएंगे.

युवाओं के इस कदम ने राजनीतिक दलों की नींद उड़ा दी है. वैसे भी उपचुनावों में आम चुनाव से वोटिंग प्रतिशत कम रहता है इससे जीत का मार्जिन भी कई बार कम हो जाता है. कई बार देखा गया है कि जीत कुछ चंद वोटों से तय होती है ऐसे में निर्दलीय उम्मीदवारों की इतनी बड़ी फौज चुनाव लड़ती है तो राजनीतिक गणित बिगड़ना स्वाभाविक है. युवा नेता भी जातिगत समीकरणों को ध्यान मे रखकर आखिर मजबूत उम्मीदवार को मैदान में रखेंगे.

ऐसे में युवाओ का यह मास्टरस्ट्रोक है, हो सकता है युवाओं की सरकारी नौकरियों की मांग पर जल्द विचार हो या उस पर जल्द फ़ैसला लिया जा सके.





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