(सिद्धार्थ मिश्रा)

पटना/नई दिल्ली. बिहार विधानसभा चुनाव में अब 16 दिन बचे हैं. लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) से अलग होने और दलितों के बड़े नेता राम विलास पासवान (Ram Vilas Paswan) के निधन से बिहार की राजनीति जटिल हो चुकी है. लोजपा के नये अध्यक्ष चिराग पासवान (Chirag Paswan) और राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) में पारस्परिक अविश्वास घर कर गया है. ऐसे में बिहार की राजनीति में इन दावेदारों के लिए जाति की राजनीति के अलावा कोई चारा नहीं बचा है.

विधानसभा चुनाव 2020 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार वोट बटोरने के लिए अपने पुराने चुनावी हथकंडे सोशल इंजीनियरिंग के सहारे खड़े नजर आ रहे हैं. नीतीश और चिराग पासवान के बीच विश्वास की कमी ने राज्य में जाति की राजनीति को जन्मा है, जो नियमित रूप से चालू है. बिहार की जातिगत राजनीति पर नजर डाले तो पटना में हुए बेलछी नरसंहार (1978) को याद किया जा सकता है, जिसमें 11 दलित मजूदरों को जिंदा जला दिया गया था.

Bihar Election 2020: चुनाव प्रचार में उतरे कन्हैया कुमार बोले- EVM की बजाय अब CM हैक हो रहेमारे गये खेत मजदूरों में आठ पासवान थे और तीन सुनार थे. गांव बेलछी नीतीश कुमार के गृह जिले नालंदा में है. वह इस बात से अच्छी तरह वाकिफ है कि बेलछी में दुसाध-कुर्मी समुदाय के बीच कलह उनके लिए बड़ी मुसीबत है. हालांकि, नीतीश खुद एक कुर्मी किसान परिवार से हैं.

कुर्मी-दुसाध समुदाय के बीच कलह
नीतीश सरकार में दुसाध समुदाय को एक विद्रोही के रूप में देखा जाता है क्योंकि ब्रिटिश शासन में उन्हें गांव चौकीदारों (चौकीदार) और दूत के रूप में शुरुआती रोजगार मिला था. वहीं ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में उन्हें काम मिला था. सुअर पालन के उनके पारंपरिक व्यवसाय को देखते हुए वह कभी भी मुस्लिम समुदाय से नहीं जुड़ पाए. वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ‘मैं हूं चौकीदार’ का नारा देकर कहीं न कहीं बिहार के दुसाध समुदाय को लुभाने काम किया है.

बिहार में सामाजिक संघर्ष

यदि बिहार के सामाजिक संघर्षों के इतिहास पर एक नजर डाले तों कई घटनाएं सामने निकलकर आती हैं. दुसाध समुदाय ने कुर्मियों के विपरीत उच्च जाति के जमीदारों जैसे यादव आदि के खिलाफ संघर्षों में अन्य शक्तिशाली मध्यस्थ जातियों का साथ देत रहा है. वहीं, 1960 के दशक में भोजपुर का नक्सली विद्रोह में दुसाध और यादव रामनरेश पासवान और रामेश्वर अहीर जैसे नेताओं के कैडर थे. भागलपुर दंगा (1989) ने भी बिहार की राजनीति में आग लगाने का काम किया. सेनारी नरसंहार (1999) में माओवादियों ने गांव के 34 भूमिहारों को सोच से भी बदतर मौत दी थी. बिहार की राजनीति में समय-समय पर ऐसे कई जातिगत दंगे देखने को मिलते रहे हैं जिन्होंने राज्य में चुनावों की तस्वीर को बदला है.

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नीतीश कुमार की सोशल इंजीनियरिंग पावर
पार्टी के प्रति सामाजिक ढांचा तैयार करने और वोटों की गिनती बढ़ाने के लिए नीतीश कुमार अपनी सोशल इंजीनियरिंग नीति पर काम करने लग जाते हैं. उन्होंने अपने पहले मुख्यमंत्री काल में महादलित का कार्ड खेला था. इसके लिए उन्होंने साल 2007 में राज्य महादलित आयोग (State Mahadalit Commission) का गठन किया जिसमें अत्यंत कमजोर जातियों को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करने की सिफारिश की गई. लेकिन नीतीश ने दुसाध और चमारों को महादलित के रूप में अनूसचित जातियों की सूची से बाहर रखा, लेकिन साल 2010 होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले आयोग की समीक्षा कर उन्होंने वोट बटोरने के लिए आयोग में दुसाध और चमार जाति को महादलित की सूची में शामिल कर दिया.

नीतीश ने लिया शराबबंदी का सहारा
नीतीश ने पार्टी को सामाजिक तौर पर और मजबूत करने के लिए साल 2015 में बिहार की राजनीति में ऐतिहासिक शराबबंदी का फैसला लिया. हालांकि इससे आबकारी राजस्व के रूप में सालाना 4 हजार करोड़ रुपये की कमाई हो रही थी, लेकिन नीतीश ने राज्य में महिलाओं को लुभाने और वोट की गिनती बढ़ाने के लिए इतनी बड़ी कीमत को दांव पर लगा दिया. पिछले 15 सालों में नीतीश कुमार ने महादलित के रूप में नए-नए वोट बनाकर राजनीति में बड़ा अनुभव हासिल किया है.

बिहार की वर्तमान राजनीति
विधानसभा चुनाव 2020 में लोजपा अध्यक्ष चिराग पासवान ने एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ने का मन बनाया है. क्योंकि चिराग को कुर्मी समुदाय के शामिल होने से गठबंधन की राजनीति में उनकी जाति के लिए कोई हमदर्दी नजर नहीं आती है. हालांकि मुस्लिम समुदाय से लोजपा की ऐतिहासिक दूरी उसमें और बीजेपी में तालमेल बैठाने का काम जरूर करती है. निष्कर्षत बिहार चुनाव एक बार फिर जातिगत राजनीति के द्वार पर आकर खड़ा हो गया है.

(Disclaimer: लेखक सीनियर जर्नलिस्ट और पॉलिटिकल एनालिस्ट हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)





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