बीमारी के साथ जीना हो, या फिर बीमारी को मात देनी हो, दोनों ही परिस्थितियों में सबसे महत्वपूर्ण होता है इसे झेलने वाले शख्स का दिमागी रूप से मजबूत होना. लेकिन, यदि रोग मानसिक ही हो तो…? यदि रोग शरीर पर कहर न ढा कर दिमाग पर कहर ढा रहा हो तो…? ऐसी परिस्थिति में रोग की पहचान करना, उसे स्वीकार कर समझना, उसके लिए मदद मांगना और इलाज की प्रक्रिया को दृढ़ निश्चय के साथ निभाना न सिर्फ जरूरी है बल्कि बहुत मुश्किल भी है. लेकिन फिर कहते हैं न, जहां आसा, तहां बासा.. आज 10 अक्टूबर को वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे (World Mental Health Day) है. आज हम आपको आशा पिल्लई से मिलवाएंगे. बाइपोलर डिस्ऑर्डर से पीड़ित आशा पिल्लई ऑयल ऐंड गैस सेक्टर की जानी मानी कंपनी शैल इंडिया बिजनस की चीफ फाइनेंशल ऑफिसर (सीएफओ) हैं. वह कॉन्फडेरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्रीज़ (सीआईआई), गुजरात, के वीमेन नेटवर्क की हेड भी हैं.
आशा हिम्मत का वह नाम हैं जिन्होंने डिप्रेशन (Depression) के इस रूप यानी इस खतरनाक मूड डिस्ऑर्डर को अपनी जिजीविषा और आसपास के लोगों के सपोर्ट के चलते काफी हद तक मात दे दी है. बाइपोलर डिस्ऑर्डर (Bipolar Disorder) मूड स्विंग का वह खतरनाक रूप है जो व्यक्ति को कभी आसमान की तरफ उछाल सा देता है और कभी पाताल की काली अंधेरी गहराइयों में ले जाता है. यह व्यक्ति को भावानात्मक रूप से पैंडुलम की भांति एक छोर से दूसरे छोर तक बेहद अनियंत्रित तरीके से लाता और ले जाता है. यूं तो उदासी इंसानी जीवन का अंग है लेकिन यदि मन लगातार कई हफ्तों या महीनों तक दुखी रहने लगे या फिर बेहद खुश रहने लगे तो यह एक प्रकार की मानसिक स्थिति होती है जो कभी-कभी मानसिक रोग के दायरे में आती है.

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बाइपोलर डिस्ऑर्डर कैसे उदासी का सामान्य फेज़ नहीं है…आशा बताती हैं कि यह एक तरह का मैनिक डिप्रेशन (Maniac Depression) है जिसमें कभी कई बार आप हाइपर एक्टिव (Hyper Active) हो जाते हैं तो कभी एकदम डाउन. आप एक साथ बहुत कुछ कर लेना चाहते हैं या उदासी की गर्त में समाने लगते हैं. वह बताती हैं कि आमतौर पर उदासी के फेज में आप एक स्माइल चेहरे पर लाकर अपने आप को नॉर्मल करने की कोशिश करते हैं और दिनचर्या पूरी करने लगते हैं लेकिन बाइपोलर के केस में आप यह ‘नाटक’ भी नहीं हो पाता.

बाइपोलर डिस्ऑर्डर कैसे उदासी का सामान्य फेज़ नहीं है…

आशा बताती हैं कि यह एक तरह का मैनिक डिप्रेशन (Maniac Depression) है जिसमें कभी कई बार आप हाइपर एक्टिव (Hyper Active) हो जाते हैं तो कभी एकदम डाउन. आप एक साथ बहुत कुछ कर लेना चाहते हैं या उदासी की गर्त में समाने लगते हैं. वह बताती हैं कि आमतौर पर उदासी के फेज में आप एक स्माइल चेहरे पर लाकर अपने आप को नॉर्मल करने की कोशिश करते हैं और दिनचर्या पूरी करने लगते हैं लेकिन बाइपोलर के केस में आप यह ‘नाटक’ भी नहीं हो पाता.

‘और उस वक्त पूरी दुनिया जैसे हिल गई थी…’

साल 2016 में, 34 साल की उम्र में उन्हें पता चला कि वह बाइपोलर हैं. पिता उस वक्त अस्तपताल में एडमिट थे और आशा विदेश से लौटी ही थीं. 5 साल की बेटी थी जिसका ध्यान भी उन्हीं को रखना था. उनका अचानक से विचलित होना और फिर अचानक से बाइपोलर ‘क्रैश’ का आना, एकबारगी तो उनकी दुनिया को हिला ही गया था. वह बताती हैं कि क्रैश, यानी वह फेज जब वह इसके अटैकिंग फेज में होती हैं, तब उनके पति और परिवार का ही नहीं बल्कि दोस्तों और सहकर्मियों का भी उन्हें पूरा सहयोग मिलता है. लेकिन जैसा कि हम जानते हैं बीमारी का दर्द तो उसी शख्स को झेलना होगा जो इससे जूझ रहा है.

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सबसे जरूरी है दवाओं का नियमित सेवन और हेल्दी लाइफस्टाइल

आशा कहती हैं, हो सकता है कई सालों से मुझे यह दिक्कत रही हो लेकिन 2016 में ही पता चला कि यह मूड स्विंग्स से काफी अलग हैं. आज की तारीख में एक साइकॉलोजिस्ट, साइकाइस्ट्रिस्ट और काउंसलर्स की मदद के साथ वह काफी हद तक इस कंडिशन के साथ जीना सीख चुकी हैं. वह बताती हैं कि इसमें थेरेपी से लेकर एक हेल्दी लाइफस्टाइल का बहुत योगदान रहता है. डॉक्टरों द्वारा प्रेस्क्राइब की गई दवाओं का सेवन भी जरूरी है. जबकि, कई बार हम कुछ बेहतर महसूस करने लगते हैं और बीच में ही छोड़ देते हैं. आशा ने भी यही किया था लेकिन उसके बाद स्थिति और बिगड़ गई. वह सलाह देती हैं कि अगर आपको दवा से कोई दिक्कत आ रही हो तो अपने डॉक्टर से बात करें. हो सकता है वह दवा बदले या फिर डोज़ कम या अधिक करे.

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नौकरी की चुनौतियों को सपोर्ट से निपटती हैं…

वह बताती हैं कि अपने क्रैश फेज में वह अपनी दिनचर्या को जहां तक संभव हो नॉर्मल रखने की कोशिश करती हैं. दवाइयां लेती हैं तो उदासी के फेज में वह इस तरह नहीं डूबतीं कि हालात बेकाबू हो जाएं. मानसिक रोग से लड़ रहे व्यक्ति के लिए दोस्त, सहपाठी, सहकर्मियों का रवैया बड़ी भूमिका निभाता है. किसी कंपनी के सीएफओ के तौर पर सक्रिय रहना और सुचारु रूप से काम कर पाना निश्चित तौर पर आसान नहीं रहा होगा. आशा यहां बताती हैं कि उनके साथ काम करने वाले लोगों का बर्ताव कभी भी नुक्ताचीनी, या उंगली उठाने का नहीं रहा, न ही किसी ने तरस खाया और न ही किसी ने नीचा दिखाने की कोशिश की. बल्कि, उन्हें हर बार सपोर्ट मिला. उनके काम और कोशिशों की तारीफ हुई. वह कहती हैं कि संगठनों और संस्थाओं को अपने कर्मियों के साथ सहयोगात्मक रवैया अपनाना चाहिए.

नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे (National Mental Health Survey) की रिपोर्ट कहती है कि 20 में से 1 भारतीय अवसाद से पीड़ित है. वहीं 15 फीसदी भारतीय ऐसे मानसिक रोगों से जूझ रहे हैं जिनका इलाज किया जाना जरूरी है. नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे की यह रिपोर्ट 2015-16 की है और हम समझ सकते हैं कि 2020 में यह स्थिति बेहतर तो नहीं ही हुई होगी. यही वजह है कि देश ही नहीं दुनिया में भी मेंटल हेल्थ को लेकर तमाम बहसें साकार रूप लेने लगी हैं और इस पर जितनी बात आज हो रही है, पहले कभी नहीं हुई. मानसिक स्वास्थ्य की दिशा में धीरे धीरे ही सही लेकिन फैल रही यह जागरुकता निश्चित तौर पर उम्मीद बंधाती है. इसी को कहते हैं देर आए दुरुस्त आयद…





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